रेल यात्रा को बेहतर बनाने हेतु सुझाव : डिवीजनल रेलवे ग्राहक कंसल्टेटिव कमेटी की सदस्य श्री अर्चित अग्रवाल के द्वारा लिखित

भारत देश में रेलवे का नेटवर्क बहुत बड़ा है फिर भी अगर किसी यात्री को ट्रेन में मनचाहे दिन का टिकट बुक कराना हो तो उसका टिकट वेटिंग लिस्ट या आरएसी में ही बुक होता है या फिर उसे अपनी यात्रा से एक दिन पहले रेल्वे कांउटर पर सुबह जल्दी लाईन में लगकर या फिर आॅनलाईन टिकट बुक करने वाले एजेन्ट से तत्काल/ प्रिमियम तत्काल में ज्यादा रूपये देकर बुकिंग करानी पड़ती है।

इसका एक सीधा और कारगर उपाय यह हो सकता है कि देशभर में लम्बे रूट (10 से 30 घंटे या उससे ऊपर) की सभी पैसेंजर गाड़ियों में 2-3 एसी व नोन एसी डबल डेकर कोच जोड़े जाये और जिन यात्रियों को 1 घंटे से लेकर 7-8 घंटे की यात्रा करनी हो, उन्हें सिर्फ डबल डेकर कोच के ही टिकट अलोट किये जाये। चाहे वो टिकट रेल्वे खिड़की से ले या फिर आॅनलाईन बुक करावें। इससे यह फायदा होगा कि लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों को सैकण्ड/थर्ड या स्लीपर कोच में आसानी से कन्फर्म टिकट मिल जायेगा।

उदाहरण के तौर पर एक यात्री जिसका कन्फर्म टिकट है वह सायं 4 बजे बांद्रा (मुम्बई) से ट्रेन नं. 12995 के सैकण्ड एसी कोच में चढ़ा और वह 6 घंटे की यात्रा कर उसी रात्रि 10.20 बजे वड़ोदरा स्टेशन पर उतर गया। उस यात्री की सीट भीलवाड़ा पहुँचने तक खाली पड़ी रही। क्योंकि जिन यात्रियों को सीधे मुम्बई से लम्बी दूरी (10 घंटे से ऊपर) की यात्रा करनी थी उन्हें वो सीट मुम्बई से खाली दिखायेगा ही नहीं। ऐसे प्रतिदिन सैकड़ो ट्रेनों में हजारों सीटे खाली पड़ी रहती है। वड़ोदरा में जो सीट खाली हुई वो केवल वड़ोदरा से आगे की और के स्टेशनों के लिए ही सीट खाली दिखायेगा।

अब यदि मुम्बई से वड़ोदरा की यात्रा करने वाले उस यात्री को डबल डेकर के एसी या नोन एसी में जिसमें बैठने के लिए आरामदायक सीटे हो और उसका किराया भी सैकण्ड/थर्ड एसी कोच (टू टायर) से कम हो तो आखिर कौन यात्री उसमें यात्रा नहीं करना चाहेगा। ये सिलसिला लगातार वड़ोदरा से आगे कम दूरी पर स्थित स्टेशनों पर चलता रहेगा। मुम्बई से यात्री चढ़ा और वड़ोदरा में उतर गया, वड़ोदरा से दूसरा यात्री चढ़ा जिसे रतलाम तक का सफर तय करना है (वड़ोदरा से रतलाम की समयावधि लगभग 4 से 5 घंटे की है) तो वह आराम से यात्रा कर रतलाम उतर जायेगा।

मेरा कहने का यही उद्देश्य है कि ट्रेन में कम दूरी की यात्रा तय करने वाले यात्रियों को पूरी बर्थ अलॉट ही क्यों की जाये। हम रोडवेज बसों, ट्रेवल्स की एसी व नाॅन एसी बसों में भी घंटो सफर बैठे-बैठे कर लेते है। तो रेलवे को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए। कम दूरी तय करने वाले यात्रियों को यदि केवल आरामदायक सीट मिल जायेगी तो लम्बी दूरी तय करने वाले यात्रियों को टिकट के लिए जल्दी सुबह लाईन में लगकर वेटिंग और आरएसी जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा ओर ना ही टिकट बनाने वाले एजेन्टों को टिकट दर से अधिक राशि का भुगतान करना पड़ेगा। जब ट्रेन में सीट्स आसानी से मिलने लगेगी तो यात्री कभी भी अपनी सीट मनचाही तारीख पर बुक करा सकता है। रेलवे अपने यात्रियों को ये सुविधा देकर अपनी इंकम में बेतहाशा वृद्धि कर सकती है। जहाँ तक मेरा विचार है इससे लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों को आसानी से पूरी बर्थ वाले सैकण्ड/थर्ड/स्लीपर कोचों में जगह मिल जायेगी और देशभर में 70 से 80 प्रतिशत यात्रियों की टिकट ना मिलने की समस्या हमेशा के लिए जड़ से खत्म हो जाएगी।

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